लखनऊ के नबाब:पुड़िया खाकर मिस्टर पीकू सड़क पर पीक मारे और कोई रोके टोके तो बोलते है अमा जाने दो यार
सिर्फ सफाई इंस्पेक्टर नहीं, हर नागरिक बने ‘सफाई प्रहरी’”

“सिर्फ सफाई इंस्पेक्टर नहीं, हर नागरिक बने ‘सफाई प्रहरी’”तभी लखनऊ होगा क्लीन और ग्रीन पुड़िया खाकर मिस्टर पीकू पीक मारे और कोई टोके तो बोलते है अमा जाने दो यार
रितेश श्रीवास्तव-ऋतुराज
लखनऊ की सड़कों, गलियों और बाजारों में बढ़ती गंदगी पर हर बार नगर निगम और सफाई कर्मचारियों को कटघरे में खड़ा कर देना आसान है, लेकिन क्या शहर को साफ रखना केवल अधिकारियों और सफाई इंस्पेक्टरों की जिम्मेदारी है?

क्या हर चौराहे पर सफाई इंस्पेक्टर झाड़ू लेकर खड़ा रहेगा कि किसी ने कूड़ा फेंका और तुरंत उठाकर डस्टबिन में डाल दे?
सवाल व्यवस्था पर जरूर उठने चाहिए, लेकिन समाज और नागरिकों की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
राजधानी में बड़ी संख्या में लोग सड़क पर ही पानी की बोतल,प्लास्टिक, पान-मसाले की पुड़िया और घरेलू कचरा फेंक देते हैं। कई जगहों पर लोग घर का कूड़ा खाली प्लॉट और नालियों में डाल देते हैं, *फिर उसी गंदगी के लिए नगर निगम को दोष देते हैं।
सच्चाई यह है कि सफाई केवलसरकारी अभियान नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन है।अगर हर नागरिक यह तय कर ले कि—
सड़क पर कूड़ा नहीं फेंकेंगे,डस्टबिन का इस्तेमाल करेंगे,नालियों में कचरा नहीं डालेंगे,अपने घर और दुकान के बाहर सफाई रखेंगे,_तो आधी समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी।_हाँ, नगर निगम और अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।जहाँ नियमित सफाई नहीं हो रही, कूड़ा उठान में लापरवाही है या कर्मचारी अनुपस्थित हैं, वहाँ कार्रवाई जरूरी है। लेकिन केवल अधिकारियों को दोष देकर नागरिक अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
लखनऊ को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए “जनभागीदारी” सबसे जरूरी है।क्योंकि शहर सिर्फ सरकार का नहीं, हम सबका है।
“जिस दिन नागरिक अपनी जिम्मेदारी समझ लेंगे, उस दिन लखनऊ की सफाई व्यवस्था पर आधी बहस अपने आप खत्म हो जाएगी।”



