नन्हे कदमों को चाहिए साफ रास्ता स्कूल जाने वाले बच्चों की राह में कूड़ा,
स्कूल जाने वाले बच्चों की राह में कूड़ा, जलभराव और बदहाल सड़कें—आखिर कब बदलेगी राजधानी की तस्वीर?

नन्हे कदमों को चाहिए साफ रास्ता
स्कूल जाने वाले बच्चों की राह में कूड़ा, जलभराव और बदहाल सड़कें—आखिर कब बदलेगी राजधानी की तस्वीर?
बच्चों के कंधों पर बस्ता है, आंखों में सपने हैं और दिल में कुछ बन जाने की उम्मीद। लेकिन राजधानी लखनऊ की कई सड़कों पर हर सुबह इन सपनों का सामना कूड़े के ढेर, बदबू, कीचड़ और जलभराव से होता है। स्कूल जाने वाले नन्हे-नन्हे कदम जब गंदगी से बचते हुए सड़क पार करते हैं, तो यह केवल असुविधा नहीं बल्कि व्यवस्था पर गंभीर सवाल भी खड़ा करता है।
शहर के कई इलाकों में सड़क किनारे दिनों तक कूड़ा पड़ा रहता है। हल्की बारिश होते ही सड़कों पर पानी भर जाता है, जिससे पैदल चलना तक मुश्किल हो जाता है। सबसे अधिक परेशानी स्कूल जाने वाले बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को झेलनी पड़ती है। कई बार बच्चे गंदे पानी में होकर स्कूल जाने को मजबूर होते हैं, जिससे संक्रमण और बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
नगर निगम समय-समय पर सफाई अभियानों और दावों की लंबी सूची पेश करता है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती। सवाल यह है कि जब राजधानी की प्रमुख सड़कों का यह हाल है, तो अंदरूनी मोहल्लों की स्थिति कैसी होगी?
एक स्वच्छ और सुरक्षित शहर केवल बड़े-बड़े अभियानों से नहीं, बल्कि रोजाना की जिम्मेदार और प्रभावी सफाई व्यवस्था से बनता है। बच्चों का भविष्य तभी सुरक्षित होगा, जब उन्हें स्कूल तक पहुंचने के लिए गंदगी और जलभराव से जंग न लड़नी पड़े।
सवाल व्यवस्था से…
क्या लखनऊ के नन्हे कदमों को कभी साफ, सुरक्षित और स्वच्छ रास्ता मिलेगा? या फिर हर बरसात और हर सुबह उन्हें इसी बदहाल व्यवस्था के बीच अपने सपनों की राह तय करनी होगी?



