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नगर निगम की ‘नींद’ पड़ी महंगी , लापरवाही में बह गए साढ़े पांच करोड़!

👉 ‼️नगर निगम की ‘नींद’ पड़ी महंगी , लापरवाही में बह गए साढ़े पांच करोड़!

👉 ‼️फाइल गायब, अधिकारी बेखबर… और खजाना खाली!

👉‼️ कमजोर पैरवी ने दिलाया ठेकेदार को फायदा, सिस्टम पर उठे सवाल

लखनऊ।
नगर निगम की कार्यशैली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। इस बार मामला इतना “हल्का” नहीं कि नजरअंदाज कर दिया जाए—यहां तो सीधे साढ़े पांच करोड़ रुपये का झटका लग गया। वजह वही पुरानी—ढीली कानूनी पैरवी, बिखरा समन्वय और जिम्मेदारी से बचने का खेल।

जानकारी के मुताबिक, कोर्ट में निगम की ओर से इतनी “मजबूत” पैरवी की गई कि मामला ठेकेदार के पक्ष में जाता दिखा और आखिरकार निगम को मोटी रकम चुकानी पड़ी। हैरानी की बात यह है कि जिन अधिकारियों को मामले की जानकारी होनी चाहिए थी, वे खुद फाइल का ठिकाना तक नहीं बता पाए।

‼️👉फाइल ढूंढते रह गए अफसर, पैसा निकल गया

मामले में सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि संबंधित फाइल ही अधिकारियों के पास उपलब्ध नहीं थी। यानी जिस केस पर करोड़ों का दांव लगा था, उसकी बुनियादी जानकारी तक सिस्टम में नहीं थी। कुछ अधिकारियों ने तो साफ कह दिया कि मामला उनके कार्यकाल से पहले का है—यानि जिम्मेदारी “पास ऑन” करने का खेल जारी है।

कानूनी रणनीति या खानापूर्ति?
सूत्रों की मानें तो कोर्ट में नगर निगम की पैरवी सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई। मजबूत पक्ष रखने के बजाय ढीला रवैया अपनाया गया, जिसका सीधा फायदा ठेकेदार को मिला। सवाल उठ रहा है कि क्या यह महज लापरवाही थी या फिर अंदरखाने कुछ और चल रहा था?

सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम
इस पूरे घटनाक्रम ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—

क्या करोड़ों के मामलों में भी इतनी लापरवाही सामान्य है?

क्यों नहीं समय रहते मजबूत कानूनी तैयारी की गई?

सीएफओ बोले अब सुप्रीम कोर्ट जाएंगे

‼️👉जनता पूछ रही—जिम्मेदार कौन?

अब जब सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये निकल चुके हैं, तो जिम्मेदारी तय करना सबसे बड़ा सवाल बन गया है। आम जनता यह जानना चाहती है कि इस नुकसान की भरपाई कौन करेगा—और क्या किसी अधिकारी पर कार्रवाई होगी या फिर मामला फाइलों में ही दब जाएगा?

नगर निगम की यह “सुस्त रफ्तार” और “ढीला रवैया” अब महंगा साबित हो रहा है। अगर समय रहते जिम्मेदारी तय नहीं की गई, तो ऐसे ही करोड़ों के नुकसान की खबरें आगे भी आती रहेंगी—और सिस्टम यूं ही “सोता” रहेगा।

पूरा मामला स्वीपिंग मशीनों की खरीद फरोख्त का है

‼️👉स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट

नगर निगम लखनऊ में करोड़ों के नुकसान का मामला अब और भी गहराता जा रहा है। पहले जहां इसे सिर्फ “कमजोर पैरवी” और “लापरवाही” बताया जा रहा था, वहीं अब सामने आए दस्तावेज़ ने पूरे मामले की परतें खोल दी हैं।
दस्तावेज़ के अनुसार, पर्यावरण कार्यों से जुड़े एक अनुबंध में शर्तों के उल्लंघन के बाद भुगतान रोका गया था। इसके खिलाफ संबंधित फर्म ने वर्ष 2021 में वाद दायर किया। इसके बाद न्यायालय ने 22 जनवरी 2023 को आदेश देते हुए नगर निगम को फर्म के पक्ष में पूरी धनराशि 8.95% ब्याज सहित चुकाने के निर्देश दिए।

कोर्ट के आदेश से निकला करोड़ों का भुगतान

मामला यहीं नहीं रुका। 27 मार्च 2025 को आदेश के अनुपालन में बैंक के माध्यम से करीब 5,48,50,020 की भारी रकम नगर निगम के खाते से निकालकर भुगतान कर दी गई। यानी जिस केस में शुरू में भुगतान रोका गया था, वही अब ब्याज के साथ और भारी पड़ गया।

‼️👉इस पूरे मामले में मीडिया के सवालों पर नगर निगम के सभी आला अधिकारियो के हलक से पानी नही उतर रहा था

सदन में विपक्ष ने काटा हंगामा तब हुआ खुलासा

अचानक बुलाये गए सदन में मनमाने तरीके से बिना बजट पर चर्चा किये बजट पास कर देना यह गलत है जिसका आरोप पार्षदो ने लगाया और यह मामला भी सदन में खुला

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